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मूल अधिकार Fundamental Rights

मूल अधिकार Fundamental Rights

मूल अधिकार संविधान द्वारा प्रदान किए गए हैं। मूल अधिकार  मौलिक एवं आधारभूत हैं। सभी व्यक्तियों को इनका उपभोग करने का अधिकार है। देश के प्रत्येक नागरिक के संतुलित एवं उत्तरदायित्व पूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए यह अधिकार नितांत आवश्यक है। यदि किसी नागरिक को इन अधिकारों से वंचित किया जाता है तो वह सर्वोच्च न्यायालय की शरण में जा सकता है। यही एक महत्वपूर्ण कारण है जो इन अधिकारों को मौलिक स्वरूप प्रदान करता है लोकतांत्रिक देश होने के कारण यहां के सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान किए गए मौलिक अधिकारों का वर्गीकरण निम्न प्रकार हैं-

1. समानता का अधिकार 

भारत के संविधान अनुसार राज्य के सभी नागरिकों को कानून का संरक्षण समान रूप से प्राप्त है। यानी क्षमता के अधिकारों में यह बात नहीं है कि जाति लिंग जन्म स्थान वर्ण अथवा पंथ के आधार पर राज्य नागरिकों में भेदभाव नहीं करेगा। सभी व्यक्ति सरकारी नौकरी हेतु आवेदन कर सकते हैं। राज्य नियुक्तियों में कोई भेदभाव नहीं करेगा। राज्य सेवाओं में आरक्षण के द्वारा पिछड़े वर्ग के लोगों के पर्याप्त प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया है। समानता के अधिकार के अंतर्गत भारत में अस्पृश्यता का उन्मूलन कर दिया गया है। अस्पृश्यता को व्यवहार में लाने वाले व्यक्ति को कानून द्वारा दंडित किया जा सकता है।

2. स्वतंत्रता का अधिकार 

प्रत्येक नागरिक को निम्न स्वतंत्रता प्राप्त है-

1. भाषण व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता-

 प्रत्येक नागरिक को भाषण व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है।

2. बिना शस्त्र शांतिपूर्ण सभा करने की स्वतंत्रता- 

प्रत्येक नागरिक को बिना शस्त्र शांतिपूर्ण सभा करने की स्वतंत्रता प्राप्त है।

3. समुदाय अथवा संघ बनाने की स्वतंत्रता- 

सभी नागरिकों को समुदाय अथवा संघ बनाने की स्वतंत्रता प्राप्त है।

4. भारत राज्य के किसी भी क्षेत्र में स्वेच्छा से भ्रमण की स्वतंत्रता- 

प्रत्येक नागरिक अपनी इच्छा अनुसार पूरे देश मेन कहीं भी घुमने की आजादी है।

5. भारत के किसी भी भाग में निवास करने की स्वतंत्रता- 

हर नागरिक को पूरे देश में कहीं भी निवास करने की स्वतंत्रता प्राप्त है।

6. व्यापार अथवा कारोबार करने की स्वतंत्रता- 

प्रत्येक नागरिक को कोई भी व्यापार अथवा कारोबार करने की स्वतंत्रता प्राप्त है।
किसी भी व्यक्ति को अपराध करके करने के दंड से अधिक दंड नहीं दिया जाएगा। व्यक्ति को उसके जीवन तथा स्वतंत्रता से तभी वंचित किया जाएगा जब उसने कानून का उल्लंघन या कोई अपराध किया हो।

3. शोषण के विरुद्ध अधिकार-

भारतीय संविधान द्वारा 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से कारखानों खदानों से खतरनाक स्थानों में काम करवाना वर्जित कर दिया है। बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने तथा आनंदपूर्ण बचपन बिताने का अवसर दिया जाना चाहिए। बच्चों के संरक्षण के लिए शोषण के विरुद्ध अधिकार कानून शस्त्र की भांति है।

4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार-

इस अधिकार द्वारा भारत की जनता को धार्मिक क्रियाकलापों में स्वतंत्रता प्रदान की गई है। राज्य की दृष्टि से सभी धर्म समान है। राज्य द्वारा संचालित किसी भी शिक्षण संस्था में धर्म विशेष की शिक्षा नहीं दी जा सकती। धार्मिक संस्थाएं अपने निजी शिक्षण संस्थाएं स्थापित कर सकती हैं।

5. संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार-

भारत विविधताओं में एकता वाला देश है। यहां भिन्न-भिन्न भाषा, खानपान व धर्मों के अनुयाई निवास करते हैं। किसी भी समुदाय को अपनी भाषा तथा अपने लिपि की रक्षा करने का अधिकार है। सरकारी तथा सरकार द्वारा अनुदानित संस्थाओं में किसी नागरिक को प्रवेश में भाषा अथवा धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता है।

6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार-

यह अधिकार अत्यंत विशिष्ट अधिकार है। यदि नागरिकों के मूल अधिकारों का हनन होता है तो वे इस अधिकार के अंतर्गत सर्वोच्च अथवा उच्च न्यायालय से निम्न लेख जारी करवा सकते हैं।

1. बंदी प्रत्यक्षीकरण- 

जब किसी व्यक्ति को बिना विधि को चित्र के गिरफ्तार किया जाता है तो उस व्यक्ति को रिहा कराने के लिए इस लेख की आवश्यकता होती है। यदि पुलिस द्वारा गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे में न्यायालय के समक्ष पेश नहीं किया जाए तो न्यायालय द्वारा यह लेख जारी किया जा सकता है।

2. परमादेश- 

इसका अभिप्राय “हम आज्ञा देते हैं” यह प्राय: सार्वजनिक कर्तव्यों को पूरा करने के लिए सरकार अथवा उसकी संस्थाओं के लिए जारी किया जाता है।

3. प्रतिषेध- 

ऊपरी न्यायालय द्वारा निम्न न्यायालय का को उनके अधिकार क्षेत्र अथवा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन करने से रोकने के लिए इस लेख का प्रयोग किया जाता है।

4. उत्प्रेषण- 

इसका अभिप्राय है “किस क्षेत्राधिकार से” यह लेख ऊपरी न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालय को जारी किया जाता है। जिसका निर्णय विधि शून्य हो।

5. अधिकार पृच्छा- 

इसका अभिप्राय है “किस आज्ञा से” यह लेख तब जारी किया जाता है जब न्यायालय यह अनुभव करें कि कोई व्यक्ति ऐसे पद को धारण किए हुए हैं जिसके लिए उसके पास निर्धारित योग्यता नहीं है।

मौलिक अधिकारों का यह रूप सबसे महत्वपूर्ण है। इसको हटा देने पर सभी अधिकारों का महत्व समाप्त हो जाता है। आपातकाल की स्थिति के दौरान केंद्र सरकार द्वारा यह अधिकार निलंबित किया जा सकता है।

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